
भारत की सबसे प्राचीन पर्वतमाला अरावली एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। 20 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने न केवल अरावली की कानूनी परिभाषा बदली, बल्कि इसके भविष्य को लेकर भी गहरी चिंता पैदा कर दी है। कोर्ट के अनुसार अब केवल वही क्षेत्र अरावली पहाड़ियों में गिने जाएंगे, जिनकी ऊंचाई आसपास की जमीन से 100 मीटर से अधिक है। इस नई व्याख्या के बाद अरावली रेंज का बड़ा हिस्सा संरक्षण के दायरे से बाहर हो सकता है।
फैसले का सीधा असर क्या होगा?
विशेषज्ञों का मानना है कि इस निर्णय के बाद अरावली क्षेत्र का लगभग 80–90 प्रतिशत भूभाग खनन, निर्माण और औद्योगिक गतिविधियों के लिए खोला जा सकता है। यह फैसला राजस्थान, हरियाणा, गुजरात और दिल्ली जैसे राज्यों को प्रभावित करेगा, जहां अरावली फैली हुई है। ये इलाके पहले से ही पानी की कमी, प्रदूषण और जलवायु असंतुलन की समस्या से जूझ रहे हैं।
पर्यावरणीय खतरे क्यों गंभीर हैं
अरावली केवल पहाड़ियों की श्रृंखला नहीं है, बल्कि यह उत्तर भारत के लिए एक प्राकृतिक सुरक्षा कवच की तरह काम करती है। यह थार रेगिस्तान को पूर्व और उत्तर दिशा में फैलने से रोकती है, मानसूनी जल को जमीन में समाहित करने में मदद करती है और जैव विविधता को सहारा देती है।
यदि इन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर खनन शुरू हुआ, तो:
- भूजल स्तर और नीचे जा सकता है
- धूल और प्रदूषण से दिल्ली-NCR की हवा और जहरीली हो सकती है
- स्थानीय वन्यजीव और वनस्पति नष्ट हो सकते हैं
- तापमान में वृद्धि और मौसम की अनिश्चितता बढ़ सकती है
पर्यावरणविदों का कहना है कि यह असर केवल एक राज्य तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका प्रभाव पूरे उत्तर भारत में महसूस किया जा सकता है।
‘अरावली ग्रीन वॉल’ पर भी सवाल
कुछ महीने पहले केंद्र सरकार ने ‘अरावली ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट’ की शुरुआत की थी, जिसका उद्देश्य अरावली क्षेत्र में हरियाली बढ़ाकर 5 किलोमीटर का बफर ज़ोन विकसित करना था। लेकिन मौजूदा फैसले के बाद यह स्पष्ट नहीं है कि यह परियोजना उसी प्रभावी रूप में आगे बढ़ पाएगी या नहीं। आलोचकों का मानना है कि संरक्षण कमज़ोर होने से ऐसे प्रोजेक्ट केवल कागज़ी बनकर रह सकते हैं।
सड़क से सोशल मीडिया तक विरोध
फैसले के बाद खासकर जयपुर और आसपास के इलाकों में विरोध प्रदर्शन तेज हो गए हैं। सोशल मीडिया पर #SaveAravalli अभियान जोर पकड़ रहा है। कई लोग इसे विकास के नाम पर प्रकृति के साथ समझौता बता रहे हैं।
राजनीतिक स्तर पर भी बयानबाज़ी तेज है। विपक्षी दल इसे पर्यावरण के खिलाफ कदम बता रहे हैं, जबकि सरकार का तर्क है कि सभी गतिविधियां वैज्ञानिक और नियंत्रित ढंग से होंगी।
रोजगार बनाम पर्यावरण की दुविधा
राजस्थान में बड़ी आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से खनन उद्योग पर निर्भर है। ऐसे में यह सवाल भी उठ रहा है कि पर्यावरण संरक्षण और रोजगार के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। विशेषज्ञों का कहना है कि अल्पकालिक आर्थिक लाभ के लिए दीर्घकालिक पर्यावरणीय नुकसान देश के लिए महंगा साबित हो सकता है।
आगे की राह
यह फैसला फिलहाल अंतिम जरूर है, लेकिन इसके सामाजिक, राजनीतिक और कानूनी प्रभाव अभी सामने आना बाकी हैं। पर्यावरण संगठनों के अनुसार आने वाले समय में इस मुद्दे पर पुनर्विचार और नई कानूनी चुनौतियां देखने को मिल सकती हैं।
अरावली को बचाने की बहस अब केवल पर्यावरण की नहीं, बल्कि भारत के भविष्य की दिशा तय करने की बहस बन चुकी है।