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    Home»Current Affairs»AK-47 क्यों है इतनी खतरनाक? भारत में कब शुरू हुआ इस्तेमाल और पुलिस कब चला सकती है यह हथियार
    Current Affairs

    AK-47 क्यों है इतनी खतरनाक? भारत में कब शुरू हुआ इस्तेमाल और पुलिस कब चला सकती है यह हथियार

    News Box BharatBy News Box BharatJuly 30, 20263 Mins Read
    AK-47 राइफल और प्रदर्शन के दौरान तैनात पुलिसकर्मी का सांकेतिक चित्र
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    बिहार के सिवान में छात्र प्रदर्शन के दौरान एक पुलिसकर्मी द्वारा AK-47 से कथित हवाई फायरिंग का मामला सामने आने के बाद इस असॉल्ट राइफल को लेकर बहस तेज हो गई है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या भीड़ नियंत्रण के दौरान पुलिस AK-47 का इस्तेमाल कर सकती है और आखिर यह हथियार भारत में कब आया था।

    AK-47 दुनिया की सबसे प्रसिद्ध असॉल्ट राइफलों में से एक है, जिसका इस्तेमाल विशेष सुरक्षा बलों और सैन्य अभियानों में किया जाता है।

    भीड़ नियंत्रण में हथियार चलाने के क्या हैं नियम?

    पूर्व वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के अनुसार, कानून-व्यवस्था की स्थिति संभालने के दौरान घातक हथियार का इस्तेमाल हमेशा अंतिम विकल्प माना जाता है।

    मानक प्रक्रिया के तहत पहले प्रदर्शनकारियों को चेतावनी दी जाती है। इसके बाद आवश्यकता पड़ने पर वाटर कैनन, आंसू गैस और लाठीचार्ज जैसे उपाय अपनाए जाते हैं। यदि इसके बावजूद पुलिस या आम लोगों की जान पर गंभीर खतरा पैदा हो जाए, तभी परिस्थितियों के अनुसार सीमित फायरिंग की अनुमति हो सकती है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि बिना उचित आदेश या गंभीर खतरे के सार्वजनिक स्थान पर AK-47 जैसे हथियार का उपयोग उचित नहीं माना जाता।

    AK-47 क्यों मानी जाती है खास?

    AK-47 का विकास 1947 में सोवियत इंजीनियर मिखाइल कलाश्निकोव ने किया था। यह दुनिया की सबसे भरोसेमंद असॉल्ट राइफलों में गिनी जाती है।

    इसकी प्रमुख विशेषताएं हैं—

    • कठिन मौसम में भी प्रभावी प्रदर्शन
    • कम रखरखाव में लंबे समय तक उपयोग
    • तेज फायरिंग क्षमता
    • मजबूत और टिकाऊ डिजाइन
    • आसान संचालन

    इसी वजह से दुनिया के कई देशों की सेनाएं, विशेष पुलिस बल और सुरक्षा एजेंसियां इसके अलग-अलग संस्करणों का उपयोग करती हैं।

    सिंगल और ऑटो मोड में क्या अंतर है?

    AK-47 में आमतौर पर अलग-अलग फायरिंग मोड होते हैं।

    • सिंगल मोड में ट्रिगर दबाने पर एक बार में एक गोली निकलती है।
    • ऑटोमैटिक मोड में ट्रिगर दबाए रखने पर लगातार गोलियां चल सकती हैं, जिससे पूरी मैगजीन बहुत कम समय में खाली हो सकती है।

    इसी कारण यह हथियार युद्ध और आतंकवाद-रोधी अभियानों में अधिक प्रभावी माना जाता है, जबकि सामान्य भीड़ नियंत्रण में इसका इस्तेमाल अत्यंत सीमित परिस्थितियों में ही किया जाता है।

    भारत में AK-47 कब आई?

    भारत में AK-47 का इस्तेमाल 1980 के दशक के आखिर में शुरू हुआ। उस समय पंजाब में आतंकवाद और उत्तर-पूर्व में उग्रवाद से निपटने के लिए सुरक्षा बलों को यह हथियार उपलब्ध कराया गया।

    इसके बाद जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद बढ़ने पर सेना, अर्धसैनिक बलों और राज्य पुलिस की विशेष इकाइयों को भी AK-47 दी गई।

    बाद में नक्सल प्रभावित राज्यों में तैनात विशेष पुलिस बलों और स्पेशल टास्क फोर्स (STF) को भी यह राइफल उपलब्ध कराई गई। दक्षिण भारत में वीरप्पन के खिलाफ चलाए गए विशेष अभियान में भी AK-47 का इस्तेमाल किया गया था।

    क्या हर पुलिसकर्मी के पास AK-47 होती है?

    नहीं। AK-47 सामान्य पुलिस का नियमित हथियार नहीं है।

    यह मुख्य रूप से—

    • स्पेशल टास्क फोर्स (STF)
    • एंटी-नक्सल यूनिट
    • आतंकवाद विरोधी दस्ता (ATS)
    • कमांडो यूनिट
    • अर्धसैनिक बल
    • सेना

    जैसी विशेष इकाइयों को ही दी जाती है। इसके उपयोग के लिए विशेष प्रशिक्षण और स्पष्ट ऑपरेशनल निर्देश होते हैं।

    सिवान मामले में क्यों उठे सवाल?

    सिवान में वायरल वीडियो में कथित तौर पर एक पुलिस जवान प्रदर्शन के दौरान AK-47 से हवाई फायरिंग करता दिखाई दिया। घटना के बाद प्रशासन ने स्पष्ट किया कि जवान को ऐसा करने का आदेश नहीं दिया गया था। मामले की जांच के बाद संबंधित जवान को निलंबित कर दिया गया और पूरे घटनाक्रम की जांच जारी है।

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