
CJP यानी कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन से जुड़े एक छात्र को ₹5 लाख के निजी मुचलके का नोटिस जारी किए जाने पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई है। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने नोएडा के कार्यकारी मजिस्ट्रेट की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए पूछा कि जब अदालत ने छात्रों के खिलाफ जबरन कार्रवाई पर रोक लगा रखी थी, तो फिर ऐसा नोटिस कैसे जारी किया गया।
छात्र अक्षत त्रिपाठी को क्यों मिला नोटिस?
मामला गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के छात्र अक्षत त्रिपाठी से जुड़ा है। रिपोर्ट के मुताबिक, पुलिस की ओर से आरोप लगाया गया कि अक्षत ने अन्य छात्रों को CJP के प्रदर्शन में शामिल होने के लिए प्रेरित किया था। इसके बाद उन्हें शांति बंधपत्र से संबंधित नोटिस जारी किया गया था।
नोटिस में छात्र से ₹5 लाख का निजी मुचलका और इतनी ही राशि के दो जमानतदार देने को कहा गया था। अक्षत ने आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि उन्होंने प्रदर्शन में शांतिपूर्ण तरीके से हिस्सा लिया था।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश का दिया गया हवाला
सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले CJP से जुड़े छात्र प्रदर्शनों को लेकर कार्रवाई पर रोक संबंधी निर्देश दिए थे। इसी संदर्भ में बुधवार को सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने मजिस्ट्रेट की कार्रवाई पर तीखी आपत्ति जताई।
रिपोर्टों के अनुसार, CJI ने कहा कि जब अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिए थे कि छात्रों के खिलाफ कोई जबरन कार्रवाई नहीं की जाएगी, तो मजिस्ट्रेट उस आदेश के विपरीत कदम कैसे उठा सकते हैं। अदालत ने संबंधित अधिकारी से इस मामले में जवाब भी मांगा है।
बाद में वापस लिया गया नोटिस
मामले में जारी शांति बंधपत्र नोटिस को बाद में वापस ले लिया गया। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस कार्रवाई को गंभीरता से लिया और संबंधित अधिकारी से स्पष्टीकरण मांगा।
क्या है शांति बंधपत्र नोटिस?
शांति बंधपत्र नोटिस को सीधे तौर पर सजा या अपराध साबित करने वाला आदेश नहीं माना जाता। यह कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए एक एहतियाती कार्रवाई होती है, जिसके तहत प्रशासन किसी व्यक्ति से भविष्य में शांति बनाए रखने का आश्वासन और आर्थिक बंधपत्र मांग सकता है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?
इस मामले ने छात्रों के विरोध-प्रदर्शन के अधिकार और प्रशासनिक कार्रवाई की सीमाओं को लेकर एक बार फिर बहस तेज कर दी है। सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी से यह संकेत भी मिला है कि अदालत के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद किसी छात्र के खिलाफ कार्रवाई किए जाने को अदालत गंभीरता से देख सकती है।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित अधिकारी से जवाब मांगा है और मामले में आगे की कार्रवाई अदालत के निर्देशों के आधार पर होगी।
