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    टकराव के रास्ते पर जयराम | सिंघम बनने की राजनीति पड़ सकती है भारी | जनता की उम्मीदों पर मत फेरिए पानी

    News Box BharatBy News Box BharatDecember 31, 20245 Mins Read
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    सुनील सिंह

    रांची। झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा (जेकेएलएम) के अध्यक्ष जयराम महतो विधायक चुने जाने के एक महीना के अंदर ही विवादों से घिर गए हैं। वह टकराव की राजनीति की ओर बढ़ रहे। उग्र और असंसदीय भाषा का इस्तेमाल करना, धमकी देना और मारपीट पर उतारू होना उनकी आदत बनती जा रही है। जिस राह पर जयराम महतो आगे बढ़ रहे हैं उस रास्ते पर चलकर राजनीति में बहुत दिनों तक टिक नहीं पाएंगे। अभी कुछ दिनों के लिए भले लोकप्रिय हो सकते हैं, लेकिन आने वाले दिनों में उनकी समस्याएं बढ़ेगी, केस- मुकदमा में फंस जाएंगे। कोर्ट कचहरी का चक्कर लगाते रहेंगे। सरकार से लड़कर बहुत दिनों तक सरवाइव करना मुश्किल होगा। सिंघम बनने की राजनीति भारी पड़ जाएगी।

    विधायक बनने के बाद और उग्र हो गए

    डुमरी से विधायक चुने जाने के बाद उनके तेवर और उग्र हो गए हैं। एक महीने के अंदर कई ऐसी घटनाएं सामने आई जिससे उनकी छवि प्रभावित हुई है। जयराम महतो को लेकर एक नेगेटिव धारणा बन रही है। विधानसभा के पहले सत्र के दौरान वह पत्रकारों से भिड़ गए। उस वीडियो को सबने देखा। इसके पहले अंचल कार्यालय के एक नजीर को धमकाया। निजी कंपनियों के मैनेजर को धमकाया। पिछले हफ्ते बेरमो में रात 2 बजे अपने समर्थकों के साथ सीसीएल के क्वार्टर पर कब्जा करने पहुंच गए। पुलिस वालों से तीखी नोकझोंक हुई। पुलिस अधिकारियों को धमकाया, उन्हें अपमानित किया। इस मामले में तो जयराम महतो के खिलाफ थाने में मुकदमा भी दर्ज हो चुका है। झारखंडी और गैर झारखंडी का मुद्दा उछाल रहे हैं। समाज में इससे तनाव बढ़ेगा, यह राज्य के लिए अच्छा नहीं होगा।

    जयराम महतो आंदोलन की उपज

    जयराम महतो आंदोलन की उपज है। झारखंड में क्षेत्रीय भाषा और रोजगार के सवाल पर शुरू हुए छात्रों के आंदोलन से वह नेता बनें। फिर विधायक बने हैं. जयराम महतो से छात्रों, बेरोजगारों, युवाओं को काफी उम्मीद है। उनके कंधे पर चढ़कर वह विधानसभा तक पहुंचे हैं। लेकिन हर मुद्दे का समाधान वह उग्र भाषा और धमकी से चाहते हैं, पर यह संभव नहीं है। टकराव के रास्ते पर चलकर कोई सफल नहीं हो सकता है। राजनीति में जयराम महतो से पहले ऐसे कई नेता उभरे। लेकिन कुछ समय बाद ही वह खो गए। इसके कई उदाहरण है। बहुत ज्यादा उदाहरण देने की जरूरत नहीं है, बिहार में आनंद मोहन का क्या जलवा था। किस तरह भीड़ खासकर युवा उनके पीछे पागल थे, यह पूरे देश ने देखा है। आनंद मोहन की चर्चा देश-विदेश में थी। अखबारों की सुर्खियां बने रहते थे। भीड़ देखकर उन्होंने बिहार में बिहार पीपुल्स पार्टी ही बना डाली थी। पार्टी ने बिहार विधानसभा का चुनाव लड़ा, चुनाव में क्या हश्र हुआ यह भी सबको पता है। अपनी आक्रामक छवि और बंदूक की राजनीति की वजह से आनंद मोहन केस मुकदमा में फंसते चले गए। मुजफ्फरपुर के तत्कालीन डीएम जी कृष्णैया की हत्याकांड में आजीवन कारावास की सजा तक काट चुके हैं। आनंद मोहन अब सीधे राजनीति में नहीं हैं। पत्नी और बेटे राजनीति कर रहे हैं। लेकिन इन्होंने भी राजनीति का ढंग बदल लिया है। जब राजनीति का ढंग बदला तो फिर सांसद- विधायक बनने का अवसर मिला। यूपी-बिहार की राजनीति में अनेक बाहुबली राजनीतिज्ञों के उभार और अंत की कहानी भी सबको पता है।

    मर्यादा टूटेगी तो राजनीति करना मुश्किल होगा

    इसलिए जयराम महतो को यदि लंबे समय तक राजनीति करनी है व जिस भरोसे और विश्वास के साथ जनता और युवाओं ने उन्हें विधायक बनाया है, यदि इस पर उन्हें खरा उतरना है तो मर्यादा में रहना होगा। यदि मर्यादा टूटेगी तो राजनीति करना मुश्किल होगा। सरकार से लड़कर बहुत दिनों तक राजनीति में टिक नहीं पाएंगे। ऐसा नहीं है कि जो विधायक मर्यादा में हैं उनकी बात नहीं सुनी जाती है। क्षेत्र में उनका काम नहीं होता है। गाली-गलौज से ही लोग सुनेंगे ऐसी बात नहीं है। इस बात पर सब कुछ निर्भर करता है कि आप लोगों से कैसे काम लेना चाहते हैं। आपकी मंशा साफ होनी चाहिए। यदि इरादे नेक नहीं होंगे तो फिर काम करना या कराना कठिन हो जाएगा। दूसरों को गाली देकर, बेईमान बताकर आप खुद ईमानदार नहीं रह सकते। आपके हर काम में ईमानदारी दिखनी चाहिए। दूसरों को गाली दीजिएगा और क्वार्टर पर कब्जा कीजिएगा तो क्या संदेश जाएगा। कब्जा करने वाले और आप में क्या फर्क रह जाएगा, क्या समझेंगे लोग।

    कई साथियों ने साथ छोड़ा

    जयराम महतो जी आप युवा हैं. झारखंडी हैं। गरीब और आंदोलनकारी परिवार से आते हैं। आपको बहुत सारी जानकारी पहले से है। पढ़े-लिखे भी हैं, अब विधायक बन चुके हैं। इसलिए आपसे मर्यादा में रहने की उम्मीद सब कर रहे हैं। झारखंडी हितों से समझौता मत करिए, लेकिन उनका मजाक भी मत बनाइए। आपके उग्र व्यवहार की वजह से आंदोलन के दौरान आपके कई प्रमुख साथी आज आपके साथ नहीं हैं। बहुत जल्द उन्होंने आपको छोड़ दिया। लोग आपसे जुड़ते चले जाएं, छोड़ें नहीं, इसका ख्याल रखिए। वरना इतिहास होते देर नहीं लगेगी। सिंघम बनने की राजनीति से परहेज करना चाहिए, यह फिल्मी दुनिया में ही संभव है। पब्लिसिटी स्टंट से नुकसान के अतिरिक्त कुछ नहीं मिलेगा।

    Jairam Mahto
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