
स्वतंत्रता दिवस से कुछ दिन पहले देश के अलग-अलग हिस्सों में तिरंगा दिखाई देने लगा है। लेकिन इस बार तिरंगे के साथ राजनीति भी उतनी ही दिखाई दे रही है। उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की Tiranga Yatra को लेकर BJP और Congress आमने-सामने हैं, तो पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व में बड़े तिरंगा मार्च की तैयारी है।
दोनों घटनाएं अलग राज्यों की हैं, लेकिन इनके बीच एक साझा राजनीतिक संदेश दिखाई देता है—राष्ट्रीय प्रतीकों को लेकर राजनीतिक दल अपनी-अपनी राष्ट्रवादी पहचान को जनता के सामने मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं।
तिरंगा बना राजनीतिक बहस का केंद्र
उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की Tiranga Yatra के बाद विवाद केवल एक रैली तक सीमित नहीं रहा। योगी ने कांग्रेस पर तिरंगे के सार्वजनिक प्रदर्शन को लेकर उसके पुराने रुख पर सवाल उठाए, जिसके जवाब में कांग्रेस ने BJP की स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत पर सवाल खड़े किए और आजादी की लड़ाई में अपनी भूमिका को सामने रखा।
यानी बहस का केंद्र सिर्फ यह नहीं है कि कौन तिरंगा लेकर चल रहा है, बल्कि यह भी है कि देशभक्ति की राजनीतिक विरासत का दावा किसके पास है।
यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक angle है।
Bengal में 50 हजार लोगों की Tiranga Rally
पश्चिम बंगाल में 10 अगस्त को एक बड़े तिरंगा मार्च की तैयारी है। Telegraph India के मुताबिक रैली दोपहर करीब 3 बजे Mayo Road से शुरू होकर Victoria Memorial की ओर जाएगी और करीब 50 हजार लोगों के शामिल होने का अनुमान है। रैली के कारण Kolkata के कई प्रमुख रास्तों पर ट्रैफिक डायवर्जन और प्रतिबंध की तैयारी भी की गई है।
यह आयोजन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पश्चिम बंगाल सरकार ने इस साल 9 से 17 अगस्त तक राज्यभर में Har Ghar Tiranga campaign चलाने के निर्देश दिए हैं। इसमें स्कूलों, कॉलेजों, सरकारी संस्थानों, युवा संगठनों और स्थानीय निकायों की भागीदारी पर जोर दिया गया है।
Bengal में तिरंगे के साथ राजनीतिक संदेश भी
West Bengal की राजनीति में इस रैली का महत्व केवल Independence Day celebration तक सीमित नहीं दिखता।
हाल की रिपोर्टिंग में Suvendu Adhikari के तिरंगा कार्यक्रमों को Bhabanipur जैसे राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण इलाके से जोड़कर देखा गया है। इससे पहले उनके एक Tiranga march में Mamata Banerjee के इलाके से गुजरने को भी राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन के तौर पर देखा गया। Adhikari ने 10 अगस्त के लिए 50 हजार लोगों वाली बड़ी रैली का आह्वान किया था।
इसका अर्थ यह है कि तिरंगा एक राष्ट्रीय प्रतीक होने के साथ-साथ राजनीतिक mobilisation का visual symbol भी बन रहा है।
असली मुकाबला तिरंगे का नहीं, Narrative का है
यहां एक महत्वपूर्ण फर्क समझना जरूरी है।
तिरंगा किसी राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं है। यह पूरे देश का राष्ट्रीय ध्वज है। लेकिन चुनावी राजनीति में राष्ट्रीय प्रतीकों के आसपास बनने वाली भीड़, तस्वीरें, नारे और भाषण जनता के सामने एक राजनीतिक narrative जरूर बनाते हैं।
आज की राजनीति में तस्वीरें बहुत महत्वपूर्ण हैं।
एक नेता हाथ में तिरंगा लेकर हजारों लोगों के बीच चलता है।
दूसरी तरफ विपक्ष उसी तिरंगे और स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत को अपने तरीके से परिभाषित करता है।
इससे सोशल मीडिया पर कुछ सेकंड का वीडियो भी राजनीतिक संदेश में बदल जाता है।
UP और Bengal की घटनाओं में क्या समानता?
दोनों राज्यों की घटनाओं को साथ रखकर देखें तो तीन बातें सामने आती हैं:
पहली—राष्ट्रवाद का public display बढ़ रहा है।
तिरंगा यात्रा, बड़े जुलूस और सामूहिक कार्यक्रम राजनीतिक संचार का हिस्सा बन रहे हैं।
दूसरी—स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत फिर बहस में है।
UP में BJP और Congress के बीच यही सवाल उभरकर सामने आया है कि स्वतंत्रता संघर्ष और राष्ट्रीय प्रतीकों की राजनीतिक विरासत किसकी है।
तीसरी—भीड़ खुद एक राजनीतिक संदेश बन गई है।
50 हजार लोगों की रैली का आंकड़ा केवल आयोजन की जानकारी नहीं है। यह राजनीतिक ताकत और जनसमर्थन दिखाने का दावा भी बन सकता है।
क्या यह आने वाले चुनावी माहौल की झलक है?
इसे सीधे चुनावी रणनीति कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन राजनीति के नजरिए से timing जरूर महत्वपूर्ण है।
स्वतंत्रता दिवस से पहले राष्ट्रीयता से जुड़े कार्यक्रमों में स्वाभाविक रूप से लोगों की रुचि बढ़ती है। राजनीतिक दल इसी माहौल में अपने संदेश को जनता तक पहुंचाते हैं।
इसलिए तिरंगा यात्राएं एक साथ देशभक्ति, जनभागीदारी और राजनीतिक communication—तीनों का माध्यम बन सकती हैं।
हालांकि किसी रैली में शामिल हर व्यक्ति को किसी राजनीतिक दल का समर्थक मानना सही नहीं होगा। राष्ट्रीय ध्वज से जुड़ा भावनात्मक जुड़ाव राजनीतिक पहचान से कहीं व्यापक है।
तिरंगे की राजनीति का बड़ा सवाल
इस पूरे घटनाक्रम से एक बड़ा सवाल भी निकलता है—क्या राष्ट्रीय प्रतीकों को राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से अलग रखा जा सकता है?
एक तरफ सरकारें और राजनीतिक दल तिरंगे के माध्यम से देशभक्ति और राष्ट्रीय एकता का संदेश देना चाहते हैं। दूसरी तरफ विपक्ष अक्सर सवाल उठाता है कि राष्ट्रवाद की परिभाषा किसी एक दल के राजनीतिक अधिकार क्षेत्र में नहीं हो सकती।
यही वजह है कि Independence Day से पहले तिरंगा सिर्फ घरों और सड़कों पर नहीं, बल्कि राजनीतिक बहस के केंद्र में भी दिखाई दे रहा है।
UP में योगी आदित्यनाथ की Tiranga Yatra और Bengal में Suvendu Adhikari की प्रस्तावित बड़ी रैली को अलग-अलग घटनाओं के रूप में देखा जा सकता है। लेकिन दोनों को साथ रखकर देखने पर भारतीय राजनीति में एक व्यापक trend दिखाई देता है—राष्ट्रीय प्रतीकों के जरिए जनता से भावनात्मक जुड़ाव और राजनीतिक संदेश दोनों मजबूत करने की कोशिश।
तिरंगा सभी भारतीयों का है। राजनीति इस बात पर हो सकती है कि उसके साथ कौन-सा संदेश जोड़ा जा रहा है और उस संदेश का राजनीतिक फायदा किसे मिलता है।
