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    Home»Lifestyle»वीर अब्दुल हमीद की यौमे पैदाइश पर विशेष: ‘जंग हत्यारों से नहीं बल्कि हौसलों से लड़ी जाती है’
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    वीर अब्दुल हमीद की यौमे पैदाइश पर विशेष: ‘जंग हत्यारों से नहीं बल्कि हौसलों से लड़ी जाती है’

    News Box BharatBy News Box BharatJuly 1, 20235 Mins Read
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    नेशनल लेटेस्ट न्यूज

    यह अवार्ड मिला…

    • परमवीर चक्र
    • समर सेवा मेडल
    • रक्षा मेडल
    • सैन्य सेवा मेडल

    ASIF NAIM। रांची: अब्दुल हमीद मसऊदी का जन्म उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के धामूपुर गांव में 1 जुलाई 1933 में एक साधारण, माध्यम परिवार में हुआ था। उनकी माता का नाम सकीना बेगम और पिता का नाम मोहम्मद उस्मान मसऊदी था। भारतीय सेना की गौरवशाली परंपरा की महत्वपूर्ण कड़ी परमवीर चक्र विजेता हवलदार अब्दुल हमीद ने 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में जिस निर्भीकता और बहादुर का प्रदर्शन किया था, वह सेना की कई पीढ़ियों के लिए आदर्श उपस्थित करती रहेगी। यूपी में जन्मा देश का यह सपूत भारत-पाक युद्ध के दौरान खेमकरण सेक्टर में तैनात था। 10 सितंबर1 965 की सुबह 8 बजे पाकिस्तानी सैनिकों ने पैटर्न टैंक रेजीमेंट के साथ खेमकरण में आकस्मिक हमला बोल दिया था। वह हर दिशा में भारी गोलीबारी के सहारे भारतीय सैनिकों को तोड़ते हुए तेजी से आगे बढ़ गए थे।

    जीप पर गन लेकर पाक सेना में तबाही मचाई

    हालात की गंभीरता और आसन्न पराजय को देखते हुए ग्रेनेड इन्फेंट्री रेजीमेंट के कंपनी क्वार्टर मास्टर हवलदार अब्दुल हमीद ने एक जीप पर अपनी गन चढ़ाई और भारी गोलीबारी के बावजूद पाकिस्तानी सैनिकों के बीच में घुस गए। जब उन्होंने पाक सेना के पहले टैंक को ध्वस्त किया तो पाक सैनिकों ने उनपर हमला बोल दिया। अपनी जान की परवाह ना किए व उन्होंने एक के बाद एक उस समय तक अजय माने जाने वाले कई पाकिस्तानी पैटर्न टैंकों को नष्ट कर दिया और दर्जनों पाक सैनिकों को मार गिराया। पाक सेना में तबाही मचाते हुए अंततत: हर तरफ से घिरा हुआ अकेला वीर सैनिक चक्रव्यूह में महाभारत के अभिमन्यु की तरह वीरगति को प्राप्त हुआ। उनकी इस शहादत ने भारतीय सैनिकों की टुकड़ी में प्राण फूंक दी और उन्होंने खेमकरण सेक्टर से पाक सैनिकों को मार भगाया। इस उत्कृष्ट और अनुपम वीरता के लिए हवलदार अब्दुल हमीद को मरणोपरांत भारतीय सेना के सर्वोच्च सम्मान से नवाजा गया। शहीद अब्दुल हमीद इसके पूर्व 1962 के भारत-चीन युद्ध में चीनी व्यूह को तोड़कर पैदल भूटान तक पहुंच जाने वाली बहादुर भारतीय सैन्य टुकड़ी के जांबाज सिपाहे थे। जिन्हें युद्ध के बाद सैन्य सेवा मेडल, समर सेवा मेडल व रक्षा मेडल जैसे सम्मान दिए गए थे।

    वतन की रक्षा करते हुए अपनी जान की कुर्बानी दे दी

    1 जुलाई 19333 को गाजीपुर के धामूपुर गांव में एक मामूली परिवार में जन्म लेने वाले परमवीर चक्र विजेता अब्दुल हमीद ने भी अपने शौर्य और पराक्रम के दम पर ऐसा मुकाम हासिल किया कि जिले के इस लाल को याद कर देश के तमाम लोग गर्व का अनुभव करते हैं। देश की सरहद की सुरक्षा में तैनात गाजीपुर के लाल ने 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान न सिर्फ दुश्मन देश के 7 पैटर्न टैंकों के परखच्चे उड़ाकर पाक सेना के दांत खट्टे कर दिए, बल्कि की वतन की रक्षा करते हुए अपनी जान की कुर्बानी देकर देश के वीर सैनिकों की सूची में अपना और जिले का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित कर दिया। देश के सर्वोच्च सैनिक सम्मान परमवीर चक्र से नवाजे गए गाजीपुर के लाल की जन्म दिवस पर देशवासियों के लिए लगातार प्रेरणास्रोत बनी रहेगी।

    रेलवे में नौकरी करने को लेकर घर से निकला

    सन 1945 में एक दिन घर से रेलवे में भर्ती होने की बात कह कर घर से निकला जवान सेना में भर्ती हो गया। 1960 तक वे जम्मू कश्मीर में ही रहे। उस समय जम्मू कश्मीर बॉर्डर पर पाकिस्तानी घुसपैठियों वेश बदलकर कश्मीर के रास्ते भारत में घुसकर उत्पात मचाते थे। एक बार अब्दुल हमीद ने भारत में प्रवेश करते हुए कुख्यात इनायत नामक आतंकी को पकड़कर अपने उच्च अधिकारियों को सौंपा। इस बहादुरी भरे काम के लिए हमीद की तरक्की हुई और वह लांस नायक बना दिए गए हैं 1962 में जब चीन ने भारत पर आक्रमण किया तो हमीद नेफा की सीमा पर तैनात थे। जहां उन्हें पहली बार प्रत्यक्ष रूप से युद्ध में भाग लेने का अवसर मिला, पर इस युद्ध में हमीद की चाह पूरी ना हो सकी। वह तो दिल में देश पर मिटकर कोई ना छोटा चक्र या पदक प्राप्त करने की दिल में मंशा रखते थे।

    भाई झुन्नन झ से कहा था, देखना जरूर कोई चक्र लेकर लौटेंगे

    इसलिए पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध में जाने से पहले उन्होंने अपने भाई से कहा था पलटन में उनकी बहुत इज्जत होती है जिनके पास कोई चक्र होता है। देखना झुन्नन हम जंग में लड़कर कोई ना कोई चक्र जरूर लेकर ही लौटेंगे। भारत मां का लाडला यह सिपाही मातृभूमि की रक्षा करते हुए देश पर शहीद हो गया। परंतु उनके बलिदान ने अपनी सेना में वह जोश भरा की दुश्मन का दिल दहल उठा। वीर अब्दुल हमीद ने अपनी शहादत से यह साबित किया कि जंग हत्यारों से नहीं बल्कि हौसलों से लड़ी जाती है। देश का यह सच्चा भक्त अपने भाई से युद्ध में कोई छोटा चक्र पाने का वादा करके आया था, पर इस वीर को अब्दुल हमीद के साथ ही वीर अब्दुल हमीद ना मिला और प्राप्त हुआ सेना का सबसे बड़ा चक्र परमवीर चक्र। आज इस वीर के यौमे पैदाइश पर NEWS BOX BHARAT सलाम करता है।

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