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    Home»Breaking News»ईरान युद्ध का असर: 100 डॉलर के पार पहुंचा कच्चा तेल | दुनिया में महंगाई का खतरा
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    ईरान युद्ध का असर: 100 डॉलर के पार पहुंचा कच्चा तेल | दुनिया में महंगाई का खतरा

    News Box BharatBy News Box BharatMarch 10, 20263 Mins Read
    होर्मुज जलडमरूमध्य में तेल टैंकर और युद्ध तनाव के बीच बढ़ती कच्चे तेल की कीमत को दर्शाती तस्वीर
    ईरान युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव के बीच कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुँच गई, जिससे वैश्विक ऊर्जा बाजार में चिंता बढ़ गई है
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    Iran-Israel War। रूस के 2022 में यूक्रेन पर हमले के बाद पहली बार कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई है। इसकी बड़ी वजह अमेरिका और इजराइल के साथ ईरान का जारी युद्ध है, जो 28 फरवरी से शुरू हुआ। इस संघर्ष ने वैश्विक ऊर्जा सप्लाई को लेकर बड़ी अनिश्चितता पैदा कर दी है।

    होर्मुज जलडमरूमध्य बना संकट का केंद्र

    दुनिया के करीब 20% कच्चे तेल की सप्लाई खाड़ी क्षेत्र से आती है और इसका बड़ा हिस्सा जहाजों के जरिए होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरता है। यह ईरान और ओमान के बीच स्थित एक संकरा समुद्री रास्ता है, जिसकी चौड़ाई सबसे संकरी जगह पर सिर्फ 39 किलोमीटर है। हर दिन लगभग 2 करोड़ बैरल तेल इसी रास्ते से गुजरता है, जो वैश्विक खपत का करीब पांचवां हिस्सा है।

    जहाजों की आवाजाही लगभग ठप

    ईरान युद्ध शुरू होने के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही लगभग रुक गई है। जहाजों पर हमले और नेविगेशन सिस्टम में दखल की वजह से कई कंपनियों ने अपने जहाजों को रास्ते के किनारे ही रोक दिया है। इससे वैश्विक सप्लाई चेन पर गंभीर असर पड़ रहा है। कम सप्लाई और बढ़ती मांग के कारण तेल की कीमतों में तेजी आ रही है, जिसका असर दुनिया भर के उपभोक्ताओं और कारोबार पर पड़ सकता है।

    एशिया पर सबसे ज्यादा असर

    होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले करीब 89% तेल की सप्लाई एशियाई देशों को जाती है। इसमें चीन, भारत, जापान और दक्षिण कोरिया सबसे बड़े खरीदार हैं। अगर यह रास्ता लंबे समय तक बाधित रहता है तो इन देशों पर बड़ा असर पड़ सकता है।

    वैकल्पिक रास्ते सीमित

    सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के पास कुछ पाइपलाइन विकल्प मौजूद हैं, लेकिन उनकी क्षमता बहुत कम है। विशेषज्ञों का कहना है कि इन विकल्पों से पूरी सप्लाई की भरपाई संभव नहीं है। अगर जहाजों की आवाजाही लंबे समय तक बंद रहती है तो दुनिया को करीब 1.5 करोड़ बैरल प्रतिदिन तेल की कमी का सामना करना पड़ सकता है।

    इतिहास में सबसे महंगा तेल कब था

    कच्चे तेल की कीमत इतिहास में सबसे ज्यादा 11 जुलाई 2008 को रही थी। उस समय ब्रेंट क्रूड 147.50 डॉलर और WTI क्रूड 147.27 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था। इतिहास में कई बार युद्ध और संकट के कारण तेल की कीमतों में बड़ा उछाल आया है, जैसे 1973 का ऑयल संकट, ईरान-इराक युद्ध, 1990 का खाड़ी युद्ध, 2003 में इराक पर अमेरिकी हमला और 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध।

    तेल से कैसे बनता है पेट्रोल

    कच्चा तेल जमीन से निकालने के बाद रिफाइनरी में भेजा जाता है, जहां इसे गर्म करके अलग-अलग उत्पादों में बदला जाता है। इससे पेट्रोल, डीजल, जेट फ्यूल समेत कई उत्पाद बनते हैं। एक बैरल कच्चे तेल में करीब 159 लीटर तेल होता है, जिससे लगभग 73 लीटर पेट्रोल तैयार होता है।

    रोजमर्रा की चीजों में भी इस्तेमाल

    तेल और गैस सिर्फ ईंधन के लिए ही नहीं, बल्कि कई रोजमर्रा की चीजों में भी इस्तेमाल होते हैं। प्लास्टिक की बोतलें, मोबाइल कवर, सिंथेटिक कपड़े, कॉस्मेटिक्स, पेंट और डिटर्जेंट जैसी हजारों चीजें पेट्रोलियम से बनती हैं।

    बढ़ती कीमतों से महंगाई का खतरा

    तेल महंगा होने से ट्रांसपोर्ट, खाद्य उत्पादन और सप्लाई चेन की लागत बढ़ जाती है। इससे दुनिया भर में महंगाई बढ़ने और आर्थिक मंदी का खतरा भी पैदा हो सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर युद्ध लंबा चलता है तो वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इसका बड़ा असर पड़ सकता है, खासकर गरीब और विकासशील देशों में जहां खाद्य संकट की स्थिति भी पैदा हो सकती है, सोर्स अल जजीरा।

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