
दुनिया की अर्थव्यवस्था में अमेरिकी डॉलर का दबदबा लंबे समय से बना हुआ है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार, निवेश और केंद्रीय बैंकों के विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर की महत्वपूर्ण भूमिका है। लेकिन अब BRICS देश वैश्विक वित्तीय व्यवस्था को ज्यादा बहुध्रुवीय बनाने और डॉलर पर निर्भरता कम करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
भारत के लिए यह मुद्दा इसलिए भी अहम है क्योंकि 2026 में BRICS की अध्यक्षता भारत के पास है। ऐसे समय में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या BRICS वास्तव में डॉलर के प्रभुत्व को चुनौती दे सकता है? और क्या अंतरराष्ट्रीय कानून देशों को अंतरराष्ट्रीय व्यापार में डॉलर इस्तेमाल करने के लिए बाध्य करता है?
क्या डॉलर का इस्तेमाल करना अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत जरूरी है?
सीधे शब्दों में इसका जवाब नहीं है।
अंतरराष्ट्रीय कानून ऐसा कोई सामान्य नियम नहीं बनाता कि देशों को आपसी व्यापार के लिए अमेरिकी डॉलर का ही इस्तेमाल करना होगा। देश अपने व्यापारिक समझौतों और भुगतान व्यवस्था में दूसरी मुद्राओं का इस्तेमाल कर सकते हैं।
मौजूदा अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक व्यवस्था का एक प्रमुख आधार International Monetary Fund यानी IMF का कानूनी ढांचा है। यह व्यवस्था 1944 के Bretton Woods सम्मेलन के बाद विकसित हुई थी।
IMF का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक सहयोग, भुगतान व्यवस्था और विनिमय दरों में स्थिरता को बढ़ावा देना है। लेकिन IMF के नियम डॉलर को दुनिया की एकमात्र अनिवार्य व्यापारिक या रिजर्व मुद्रा घोषित नहीं करते।
फिर दुनिया में डॉलर का इतना दबदबा क्यों है?
यहां सबसे महत्वपूर्ण बात सामने आती है।
डॉलर का प्रभुत्व किसी एक अंतरराष्ट्रीय कानून की वजह से नहीं है। इसके पीछे अमेरिका की आर्थिक ताकत, उसके वित्तीय बाजारों की गहराई और तरलता, अमेरिकी संस्थानों पर भरोसा और डॉलर में उपलब्ध बड़े पैमाने की परिसंपत्तियां जैसे कई कारण हैं।
यानी डॉलर की ताकत को सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि आर्थिक और संस्थागत ताकत से समझना होगा।
इसी वजह से अगर BRICS देश डॉलर का इस्तेमाल कम भी करते हैं, तो इससे तुरंत डॉलर की वैश्विक भूमिका खत्म नहीं हो जाएगी।
BRICS क्या बदलना चाहता है?
BRICS के भीतर कई देश अंतरराष्ट्रीय व्यापार में स्थानीय मुद्राओं के इस्तेमाल को बढ़ाने और अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता घटाने की बात करते रहे हैं।
इस दिशा में वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था, स्थानीय मुद्रा में व्यापार और BRICS देशों के बीच वित्तीय सहयोग जैसे विकल्पों पर चर्चा होती रही है। BRICS Pay जैसी पहल को भी डॉलर और SWIFT आधारित भुगतान व्यवस्था पर निर्भरता कम करने के संभावित रास्ते के रूप में देखा गया है। हालांकि, ऐसी वैकल्पिक व्यवस्था को वैश्विक स्तर पर स्थापित करना आसान नहीं होगा।
क्या BRICS की अपनी मुद्रा डॉलर की जगह ले सकती है?
यही सबसे बड़ा सवाल है।
BRICS के बीच किसी साझा मुद्रा की चर्चा अक्सर होती है, लेकिन एक साझा BRICS मुद्रा का अस्तित्व में आना और उसका डॉलर का वैश्विक विकल्प बनना दो अलग बातें हैं।
किसी मुद्रा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत बनाने के लिए सिर्फ बड़ी अर्थव्यवस्था काफी नहीं होती। इसके लिए वित्तीय बाजारों की गहराई, भरोसेमंद संस्थाएं, व्यापक स्वीकार्यता, स्थिरता और बड़ी मात्रा में आसानी से कारोबार योग्य परिसंपत्तियां भी जरूरी होती हैं।
इसके अलावा BRICS के सदस्य देशों की अर्थव्यवस्थाओं, राजनीतिक प्राथमिकताओं और मौद्रिक नीतियों में काफी अंतर है। इसलिए एक साझा मुद्रा बनाना बेहद जटिल प्रक्रिया होगी।
भारत की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण क्यों है?
भारत इस पूरे समीकरण में एक अलग स्थिति रखता है।
एक तरफ भारत BRICS के माध्यम से वैश्विक वित्तीय संस्थाओं में सुधार और विकासशील देशों की ज्यादा भागीदारी की वकालत करता है। दूसरी तरफ भारत मौजूदा वैश्विक वित्तीय व्यवस्था का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है।
इसलिए भारत के लिए रणनीति पूरी तरह “डॉलर खत्म करो” वाली नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार में विकल्प बढ़ाने और अपनी आर्थिक स्वतंत्रता मजबूत करने की हो सकती है।
भारत के लिए स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ने का फायदा यह हो सकता है कि कुछ अंतरराष्ट्रीय लेनदेन में डॉलर की जरूरत कम हो और विदेशी मुद्रा के जोखिम को अलग तरीके से मैनेज किया जा सके।
क्या डॉलर का दबदबा सच में खत्म हो जाएगा?
फिलहाल ऐसा कहना जल्दबाजी होगी।
BRICS की बढ़ती आर्थिक और राजनीतिक ताकत डॉलर की भूमिका को चुनौती दे सकती है, लेकिन डॉलर की जगह लेना बहुत लंबी प्रक्रिया होगी। BRICS देशों के बीच भी व्यापारिक हित और राजनीतिक प्राथमिकताएं हमेशा एक जैसी नहीं हैं।
इसके अलावा चीन, भारत और दूसरे BRICS देशों के अमेरिका तथा पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं के साथ बड़े व्यापारिक संबंध हैं। इसलिए पूरी तरह अलग वित्तीय व्यवस्था बनाना व्यावहारिक रूप से काफी मुश्किल होगा।
असली बदलाव कहां हो सकता है?
संभव है कि भविष्य में दुनिया में एक ही मुद्रा का पूर्ण प्रभुत्व रहने के बजाय कई मुद्राओं और भुगतान प्रणालियों का इस्तेमाल बढ़े।
यानी BRICS का सबसे बड़ा प्रभाव डॉलर को अचानक हटाना नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार में उसके विकल्पों को मजबूत करना हो सकता है।
अगर BRICS देश स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, वैकल्पिक भुगतान नेटवर्क और वित्तीय संस्थानों को लगातार मजबूत करते हैं, तो वैश्विक वित्तीय व्यवस्था धीरे-धीरे ज्यादा बहुध्रुवीय हो सकती है।
BRICS के सामने चुनौती सिर्फ डॉलर को हटाने की नहीं है, बल्कि एक ऐसी वैकल्पिक वित्तीय व्यवस्था तैयार करने की है जिस पर दुनिया के दूसरे देश भी भरोसा कर सकें।
अंतरराष्ट्रीय कानून देशों को डॉलर इस्तेमाल करने के लिए मजबूर नहीं करता। डॉलर की वास्तविक ताकत उसकी आर्थिक क्षमता, वित्तीय बाजारों और वैश्विक भरोसे से आती है। इसलिए BRICS अगर डॉलर की भूमिका कम करना चाहता है तो उसे केवल राजनीतिक घोषणा नहीं, बल्कि मजबूत और भरोसेमंद वित्तीय विकल्प तैयार करने होंगे।
भारत के लिए यह प्रक्रिया एक अवसर भी है। BRICS की अध्यक्षता के दौरान भारत अगर वित्तीय सहयोग, स्थानीय मुद्रा में व्यापार और वैश्विक संस्थाओं में सुधार जैसे मुद्दों को आगे बढ़ाता है, तो इससे भारत की वैश्विक आर्थिक भूमिका और मजबूत हो सकती है।
