
दिल्ली के जंतर-मंतर पर जुलाई 2026 में हुए NEET विरोध प्रदर्शन ने नागरिकों के विरोध के अधिकार, पुलिस निगरानी और पुराने आपराधिक रिकॉर्ड के इस्तेमाल को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। LiveLaw में प्रकाशित एक विश्लेषण में सवाल उठाया गया है कि अगर किसी व्यक्ति के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान कोई खास आरोप नहीं है, तो क्या उसके पुराने आपराधिक रिकॉर्ड के आधार पर उसे दूसरे प्रदर्शनकारियों से अलग माना जा सकता है?
प्रदर्शन के दौरान हजारों लोगों की हुई पहचान
रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली पुलिस ने NEET प्रदर्शन और उससे जुड़े घटनाक्रमों को लेकर 13 FIR दर्ज की थीं। प्रदर्शन के दौरान फेस रिकग्निशन सिस्टम के जरिए 2,873 लोगों की पहचान की गई। इनमें 2,402 लोगों की पहचान Crime-Kundli डेटाबेस और 471 की पुलिस डोजियर रिकॉर्ड के जरिए हुई।
पुलिस के अनुसार इनमें 989 लोगों के पुराने आपराधिक रिकॉर्ड मिले थे। इन रिकॉर्ड में हत्या, लूट, दुष्कर्म, Arms Act और नशीले पदार्थों से जुड़े मामले भी शामिल बताए गए।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद बहस तेज
28 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को दर्ज FIR की जांच आगे बढ़ाने की अनुमति दी थी, लेकिन प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ सामान्य तौर पर जबरदस्ती की कार्रवाई से सुरक्षा दी थी। हालांकि, गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को इस सुरक्षा से अलग रखा गया था।
इसके बाद 3 अगस्त को कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ‘criminal antecedents’ का मतलब गंभीर और जघन्य अपराधों से जुड़ी पृष्ठभूमि से है। राज्यों को कानून के अनुसार FIR बंद करने या वापस लेने की प्रक्रिया अपनाने की स्वतंत्रता भी दी गई।
पुराना रिकॉर्ड प्रदर्शन के दिन के व्यवहार का सबूत नहीं
विश्लेषण का सबसे अहम सवाल यही है कि किसी व्यक्ति का पुराना रिकॉर्ड यह साबित नहीं करता कि उसने मौजूदा प्रदर्शन में कोई अपराध किया था।
किसी व्यक्ति के नाम पर FIR होना, मुकदमा चलना, दोषसिद्धि होना, बरी होना या मामला पहले ही बंद हो जाना—इन सभी स्थितियों को सामान्य तौर पर ‘criminal record’ की श्रेणी में देखा जा सकता है। लेकिन केवल डेटाबेस में नाम दर्ज होने से यह पता नहीं चलता कि संबंधित मामला किस स्थिति में है।
कानून में किसी व्यक्ति की आपराधिक जिम्मेदारी उस खास घटना में उसके कथित आचरण और उपलब्ध सबूतों के आधार पर तय होती है। इसलिए किसी पुराने रिकॉर्ड को अपने आप यह मान लेने का आधार नहीं बनाया जा सकता कि व्यक्ति ने प्रदर्शन के दौरान भी गलत काम किया होगा।
Preventive policing और criminal justice में अंतर
विश्लेषण में यह भी बताया गया है कि आपराधिक पृष्ठभूमि का इस्तेमाल हर परिस्थिति में गलत नहीं है। Preventive policing में किसी संभावित खतरे को रोकने के लिए पिछले आचरण को ध्यान में रखा जा सकता है, लेकिन इसके लिए कानूनी प्रक्रिया, उचित आधार और proportionality जैसी शर्तें जरूरी हैं।
समस्या तब पैदा होती है जब भविष्य के संभावित खतरे का आकलन करने वाला तरीका किसी पुराने रिकॉर्ड के आधार पर मौजूदा आपराधिक मामले में इस्तेमाल होने लगे। प्रदर्शन खत्म होने के बाद यदि किसी व्यक्ति के पुराने रिकॉर्ड को उसके खिलाफ अलग व्यवहार का आधार बनाया जाता है, तो यह सवाल उठता है कि कार्रवाई मौजूदा आचरण पर आधारित है या उसके अतीत पर।
क्या इससे विरोध के अधिकार पर असर पड़ सकता है?
भारत में शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखना और सार्वजनिक रूप से एकत्र होना लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। अगर किसी व्यक्ति को केवल पुराने रिकॉर्ड के कारण दूसरे नागरिकों की तुलना में विरोध करने के अधिकार के इस्तेमाल में अलग नजर से देखा जाता है, तो राजनीतिक भागीदारी की समानता पर सवाल उठ सकते हैं।
यह चिंता खास तौर पर उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है जो पहले से पुलिस या प्रशासनिक निगरानी के दायरे में रहे हैं। किसी व्यक्ति के पुराने रिकॉर्ड का लेबल उसकी सार्वजनिक छवि को भी प्रभावित कर सकता है और उसे लोकतांत्रिक गतिविधियों से दूर कर सकता है।
नागरिक या संभावित खतरा—कहां खींची जाए सीमा?
इस पूरे विवाद में एक बड़ा संवैधानिक सवाल यह है कि राज्य किसी नागरिक को उसके पुराने रिकॉर्ड के आधार पर किस हद तक ‘खतरनाक’ मान सकता है।
कानून किसी व्यक्ति को उसके किए गए कृत्य के लिए जिम्मेदार मानता है। लेकिन जब उसी व्यक्ति के पुराने रिकॉर्ड को उसके भविष्य के राजनीतिक व्यवहार का अनुमान लगाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है, तो नागरिक की राजनीतिक भागीदारी पर राज्य के आकलन का प्रभाव पड़ सकता है।
यही वजह है कि पुराने आपराधिक रिकॉर्ड और मौजूदा प्रदर्शन में किए गए कथित अपराध के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखना जरूरी माना जाता है।
मामला अभी पूरी तरह सुलझा नहीं
सुप्रीम कोर्ट की ओर से गंभीर और जघन्य आपराधिक पृष्ठभूमि को लेकर किया गया स्पष्टीकरण इस बहस में महत्वपूर्ण है। लेकिन बड़ा सवाल अभी भी बना हुआ है कि लोकतांत्रिक अधिकारों के इस्तेमाल में किसी नागरिक के पुराने रिकॉर्ड को आधार बनाने की स्पष्ट सीमा क्या होनी चाहिए।
जंतर-मंतर प्रदर्शन से जुड़ा यह विवाद सिर्फ एक प्रदर्शन या कुछ लोगों के खिलाफ कार्रवाई तक सीमित नहीं है। यह सवाल नागरिक स्वतंत्रता, पुलिस डेटाबेस, निगरानी तकनीक और राज्य की preventive powers के बीच संतुलन से भी जुड़ा है।
