

नई दिल्ली : जिस हवा में दिल्ली-एनसीआर के लोग हर रोज़ सांस ले रहे हैं, उसके ‘स्वास्थ्य’ की निगरानी करने वाले उपकरण ही बीमार पड़ गए हैं। एक चौंकाने वाली पड़ताल से पता चला है कि राजधानी में लगे वायु गुणवत्ता निगरानी (Air Quality Monitoring) स्टेशनों की हालत बेहद खस्ता है। कहीं सेंसर खराब है, कहीं डिस्प्ले बंद पड़ा है, और सबसे बड़ी बात, कुछ स्टेशन तो ऐसे लगाए गए हैं कि उनकी रीडिंग पर ही सवाल खड़े हो गए हैं। मौसम विभाग ने चेतावनी दी है कि मंगलवार को दिल्ली का वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) ‘गंभीर’ (Severe) श्रेणी में पहुँच सकता है, जो स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक स्तर है।
मंगलवार का खतरा: ‘गंभीर’ श्रेणी में AQI
सोमवार को दिल्ली का समग्र AQI ‘बहुत खराब’ (Very Poor, 301-400) श्रेणी में 316 के आसपास रहा। लेकिन मौसम विभाग की प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली (Early Warning System) के अनुसार, हवा की धीमी गति और प्रदूषकों के जमाव के कारण मंगलवार को AQI 401 से 500 के बीच यानी ‘गंभीर’ श्रेणी में जाने की प्रबल संभावना है।
‘गंभीर’ (Severe) हवा का मतलब है कि यह स्वस्थ लोगों को भी प्रभावित करेगी, और अस्थमा, हृदय या फेफड़ों की बीमारी वाले लोगों के लिए तो यह आपातकालीन स्थिति के समान है।
इस चेतावनी के बाद, दिल्ली अभिभावक संघों ने भी सरकार से अपील की है कि बच्चों को बढ़ते स्वास्थ्य जोखिम से बचाने के लिए स्कूलों में ऑनलाइन कक्षाएं फिर से शुरू की जाएं।
39 स्टेशनों का नेटवर्क, पर विश्वसनीय डेटा का अभाव
दिल्ली में प्रदूषण के स्तर का लाइव डेटा देने के लिए कुल 39 वायु गुणवत्ता निगरानी स्टेशन (AQI Stations) मौजूद हैं। मगर हैरानी की बात यह है कि रोज़ाना औसत AQI निकालने के लिए सभी 39 स्टेशनों का डेटा इस्तेमाल नहीं होता। कभी 38, कभी 37, तो कभी इससे भी कम स्टेशनों के आधार पर पूरे शहर का औसत AQI घोषित कर दिया जाता है।
जमीनी हकीकत: उपकरण, स्थान और पारदर्शिता पर संदेह
- डिस्प्ले बंद: लोधी रोड पर केंद्रीय पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की बिल्डिंग में लगा एक्यूआई स्टेशन का डिस्प्ले बोर्ड काफी समय से बंद पड़ा है।
- पेड़ों में ‘छिपा’ स्टेशन: आरके पुरम में, केंद्रीय विद्यालय की छत पर लगा स्टेशन घने पेड़ों के पीछे लगभग अदृश्य रहता है। यह स्टेशन मुख्य सड़क से भी लगभग 50 मीटर दूर है। सवाल यह है कि यदि स्टेशन ही आम आदमी की पहुँच से दूर है, तो पारदर्शिता कैसी?
- हरियाली के बीच रीडिंग: बवाना के महर्षि वाल्मीकि अस्पताल परिसर में लगा स्टेशन पेड़ों के बीच है, जिससे स्वाभाविक रूप से ‘साफ’ रीडिंग आने की आशंका है। इसका डिस्प्ले भी 200 मीटर दूर है और ठीक से दिखाई नहीं देता।
- अधूरा डेटा: नजफगढ़ के स्टेशन का AQI डिस्प्ले तो ठीक काम कर रहा है, लेकिन इसका PM 2.5 और PM 10 का डेटा CPCB (केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड) और DPCC (दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति) की वेबसाइटों पर अनियमित रूप से आता है।
विशेषज्ञों की गंभीर चेतावनी
देश के जाने-माने पर्यावरण विशेषज्ञ इस स्थिति को बेहद गंभीर मान रहे हैं:
“AQI का सही डेटा जानना एक आम आदमी का अधिकार है। इन स्टेशनों को पेड़ों से ढका नहीं होना चाहिए और स्पष्ट डेटा संग्रह के लिए स्टेशन के आसपास 30 डिग्री के कोण पर कोई बाधा नहीं होनी चाहिए।”
– मोहन पी. जॉर्ज, (पूर्व वैज्ञानिक, DPCC)
सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायरमेंट (CSE) की महानिदेशक सुनीता नारायण ने तो सीधे तौर पर कहा कि पहले CPCB के AQI डेटा पर भरोसा होता था, लेकिन अब ऐसा नहीं कहा जा सकता। उन्होंने आशंका जताई कि कहीं न कहीं स्टेशनों को इस तरह लगाया जाता है या कोशिश की जाती है कि एक्यूआई कम आए, जो कि गलत है।
अधिकारियों का पक्ष: ‘तकनीकी खराबी’ और ‘अपग्रेडेशन’ का हवाला
CPCB के सदस्य डॉ. अनिल गुप्ता ने स्वीकार किया कि तकनीकी खामी और मौसम के कारण कुछ दिक्कतें आ जाती हैं, जिन्हें जल्द दुरुस्त किया जाता है। उन्होंने कहा कि स्टेशनों को अपग्रेड करने की प्रक्रिया पर काम चल रहा है और डेटा छिपाने या उसमें छेड़छाड़ की कोई मंशा नहीं है।
आगे क्या?
दिल्ली, जो पहले ही दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में से एक है, वहाँ की हवा की गुणवत्ता मापने वाले उपकरणों का खराब होना एक बड़ा खतरा है। यह सिर्फ तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि जनता के स्वास्थ्य से जुड़ा सीधा सवाल है। सरकार और संबंधित एजेंसियों को न केवल खराब पड़े स्टेशनों को तुरंत ठीक करवाना चाहिए, बल्कि उनकी स्थापना के मानकों की भी गंभीरता से जाँच करनी चाहिए ताकि राजधानी को प्रदूषण की एक पारदर्शी और प्रामाणिक तस्वीर मिल सके।