
नई दिल्ली: मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों (EC) की नियुक्ति प्रक्रिया एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट में बहस का विषय बन गई है। अदालत ने केंद्र सरकार से पूछा है कि जब CBI निदेशक जैसे अहम पदों की चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) शामिल होते हैं, तो चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया से उन्हें क्यों बाहर रखा गया।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि चुनाव आयोग केवल स्वतंत्र होकर काम ही न करे, बल्कि उसकी स्वतंत्रता लोगों को दिखाई भी देनी चाहिए। जस्टिस दत्ता ने कहा कि जैसे न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ भी दिखना चाहिए, उसी तरह चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया में भी निष्पक्षता दिखाई देनी चाहिए।
विवाद की शुरुआत कैसे हुई?
मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने अनूप बरनवाल मामले में फैसला दिया था कि जब तक संसद नया कानून नहीं बनाती, तब तक मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश वाली समिति की सिफारिश पर होगी।
हालांकि, दिसंबर 2023 में संसद ने नया कानून पारित किया। इस कानून में CJI की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को चयन समिति में शामिल कर दिया गया। इसके बाद समिति में प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और एक केंद्रीय मंत्री शामिल हो गए।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इससे चयन समिति में सरकार का बहुमत (2:1) हो जाता है और चुनाव आयोग की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।
सरकार ने क्या कहा?
केंद्र सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कानून का बचाव किया। उन्होंने कहा कि संसद को कानून बनाने का अधिकार है और उसके विधायी निर्णय पर सवाल नहीं उठाया जा सकता।
तुषार मेहता ने अदालत से कहा कि प्रधानमंत्री के पद की गरिमा पर भरोसा किया जाना चाहिए। उनके मुताबिक यह मानकर नहीं चला जा सकता कि प्रधानमंत्री लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ काम करेंगे।
हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि मामला प्रधानमंत्री पर अविश्वास का नहीं, बल्कि नियुक्ति प्रक्रिया की पारदर्शिता और संस्थागत निष्पक्षता का है। सुनवाई के दौरान पीठ ने यह भी पूछा कि सरकार में कितने मंत्रियों के खिलाफ आपराधिक मामले लंबित हैं और याद दिलाया कि पहले भी अदालत निर्वाचित सरकारों से स्वच्छ प्रशासन की अपेक्षा जता चुकी है।
अब आगे क्या होगा?
केंद्र सरकार ने मांग की है कि इस मामले को पांच जजों की संविधान पीठ के पास भेजा जाए क्योंकि इसमें महत्वपूर्ण संवैधानिक सवाल जुड़े हैं। याचिकाकर्ताओं ने इसका विरोध करते हुए कहा कि लंबी सुनवाई के बाद अब यह मांग उठाना उचित नहीं है।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। अदालत पहले यह तय करेगी कि मामले की सुनवाई दो जजों की पीठ करेगी या इसे संविधान पीठ के पास भेजा जाएगा।
लोकतंत्र में चुनाव आयोग की निष्पक्षता को बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट का अगला फैसला भविष्य की नियुक्ति प्रक्रिया की दिशा तय कर सकता है।
