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    Home»Current Affairs»30 साल बाद घर लौटेगा एवरेस्ट पर सोया भारतीय पर्वतारोही! आखिर खत्म होगा परिवार का लंबा इंतज़ार
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    30 साल बाद घर लौटेगा एवरेस्ट पर सोया भारतीय पर्वतारोही! आखिर खत्म होगा परिवार का लंबा इंतज़ार

    News Box BharatBy News Box BharatAugust 7, 2026Updated:August 7, 20264 Mins Read
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    माउंट एवरेस्ट पर बर्फ में दफन एक कहानी आखिरकार 30 साल बाद अपने घर लौटने की उम्मीद जगा रही है। 1996 में दुनिया की सबसे ऊंची चोटी पर जान गंवाने वाले भारतीय पर्वतारोही त्सेवांग मोरुप (Tsewang Morup) का शव अब नीचे लाने की तैयारी शुरू हो चुकी है। यह सिर्फ एक रेस्क्यू ऑपरेशन नहीं, बल्कि तीन दशक से इंतजार कर रहे परिवार की भावनाओं से जुड़ी कहानी है।

    करीब 30 वर्षों से मोरुप का शव माउंट एवरेस्ट के ऊपरी हिस्से में बर्फ के बीच पड़ा हुआ है। वर्षों तक यह शव वहां से गुजरने वाले पर्वतारोहियों के लिए एक पहचान (लैंडमार्क) बन गया था। अब पहली बार परिवार को उम्मीद जगी है कि उन्हें अपने प्रियजन को अंतिम विदाई देने का अवसर मिल सकता है।

    कौन थे त्सेवांग मोरुप?

    त्सेवांग मोरुप लद्दाख के रहने वाले एक अनुभवी भारतीय पर्वतारोही थे। वह वर्ष 1996 के भारतीय एवरेस्ट अभियान का हिस्सा थे। शिखर के बेहद करीब पहुंचने के दौरान खराब मौसम और कठिन परिस्थितियों में उनकी मौत हो गई थी।

    ऊंचाई और खराब मौसम के कारण उस समय उनका शव नीचे नहीं लाया जा सका और वह वहीं बर्फ के बीच रह गया।

    1996 क्यों माना जाता है एवरेस्ट का सबसे दुखद साल?

    एवरेस्ट के इतिहास में 1996 का सीजन सबसे घातक अभियानों में गिना जाता है। उसी वर्ष अचानक आए बर्फीले तूफान और खराब मौसम के कारण कई देशों के पर्वतारोहियों की जान चली गई थी।

    इसी त्रासदी पर बाद में कई किताबें लिखी गईं और हॉलीवुड फिल्म “Everest” (2015) भी बनाई गई।

    30 साल बाद क्यों शुरू हुआ शव लाने का अभियान?

    हाल के वर्षों में नेपाल सरकार ने माउंट एवरेस्ट पर पड़े कचरे, ऑक्सीजन सिलेंडर और वर्षों से पड़े शवों को हटाने के लिए विशेष अभियान शुरू किया है।

    इस अभियान का उद्देश्य सिर्फ पर्वत को साफ रखना नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और पर्वतारोहियों की सुरक्षा भी है। इसी अभियान के तहत अब त्सेवांग मोरुप के शव को भी नीचे लाने की कोशिश की जा रही है।

    हालांकि यह मिशन बेहद चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है।

    एवरेस्ट पर शव नीचे लाना क्यों है सबसे मुश्किल काम?

    माउंट एवरेस्ट की 8,000 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले हिस्से को ‘डेथ ज़ोन’ कहा जाता है।

    यहां ऑक्सीजन समुद्र तल की तुलना में लगभग एक-तिहाई रह जाती है। तापमान कई बार -30 से -40 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है और तेज हवाएं सामान्य रूप से खड़े रहना भी मुश्किल बना देती हैं।

    ऐसी स्थिति में किसी शव को नीचे लाने के लिए प्रशिक्षित शेरपा, विशेष उपकरण, कई दिनों की मेहनत और लाखों रुपये का खर्च आता है। कई बार रेस्क्यू करने वाले लोगों की जान भी खतरे में पड़ जाती है। यही वजह है कि वर्षों तक कई पर्वतारोहियों के शव एवरेस्ट पर ही रह जाते हैं।

    परिवार के लिए क्यों खास है यह पल?

    करीब तीन दशक से मोरुप का परिवार उनके अंतिम संस्कार का इंतजार कर रहा है।

    यदि यह अभियान सफल रहता है, तो परिवार धार्मिक परंपराओं के अनुसार उनका अंतिम संस्कार कर सकेगा। परिजनों के लिए यह सिर्फ शव की वापसी नहीं, बल्कि 30 साल से अधूरी रह गई एक भावनात्मक यात्रा का अंत होगा।

    एवरेस्ट पर अभी भी मौजूद हैं कई शव

    विशेषज्ञों के अनुसार माउंट एवरेस्ट पर आज भी कई पर्वतारोहियों के शव मौजूद हैं। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और ऊंचाई के कारण उन्हें नीचे लाना बेहद जोखिम भरा होता है।

    इसी कारण नेपाल सरकार समय-समय पर सफाई और रिकवरी अभियान चलाती रहती है।

    मुख्य बातें

    • त्सेवांग मोरुप लद्दाख के रहने वाले भारतीय पर्वतारोही थे।
    • 1996 के भारतीय एवरेस्ट अभियान के दौरान उनकी मौत हुई थी।
    • उनका शव करीब 30 वर्षों से एवरेस्ट पर मौजूद है।
    • नेपाल सरकार के विशेष अभियान के तहत अब शव को नीचे लाने की तैयारी चल रही है।
    • परिवार को पहली बार अंतिम संस्कार की उम्मीद जगी है।
    • 8,000 मीटर से ऊपर के ‘डेथ ज़ोन’ में शव निकालना दुनिया के सबसे कठिन रेस्क्यू ऑपरेशनों में माना जाता है।

    त्सेवांग मोरुप की कहानी सिर्फ एक पर्वतारोही की नहीं, बल्कि उस परिवार की भी है जिसने 30 वर्षों तक उम्मीद नहीं छोड़ी। अगर यह अभियान सफल होता है, तो माउंट एवरेस्ट की बर्फ में दबी एक अधूरी कहानी आखिरकार अपने घर लौटेगी।

    Everest Expedition India News Mount Everest Tsewang Morup
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