
दिल्ली हाईकोर्ट ने 11 साल के एक बेघर बच्चे के साथ यौन अपराध के मामले में निचली अदालत के दोषसिद्धि के फैसले को बरकरार रखा है। अदालत ने इस मामले में एक बेहद अहम बात कही—सड़क पर रहने वाले बच्चे से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह किसी traumatising घटना की तारीख, समय, कपड़ों या घटनाक्रम की हर छोटी जानकारी उसी सटीकता से याद रखेगा, जैसी किसी स्थिर और सुरक्षित माहौल में रहने वाले गवाह से की जाती है।
हाईकोर्ट ने आरोपी की दोषसिद्धि में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। हालांकि, अदालत ने निचली अदालत की ओर से दी गई 20 साल की सजा को घटाकर 10 साल कर दिया। इसकी वजह यह थी कि अपराध नवंबर 2016 में हुआ था और उस समय संबंधित कानून के तहत न्यूनतम सजा 10 साल थी। पॉक्सो अधिनियम की धारा 6 में न्यूनतम 20 साल की सजा का प्रावधान बाद में 16 अगस्त 2019 से लागू हुआ।
मामला करीब एक दशक पुराना, फैसला अब आया
यह मामला नवंबर 2016 का है। अभियोजन के अनुसार, 11 साल का बच्चा उस समय कश्मीरी गेट इलाके में रेलवे पुल के नीचे रह रहा था। बच्चा सड़क पर रहने वाले परिवारों और बच्चों की तरह बेहद अस्थिर परिस्थितियों में जीवन गुजार रहा था और कूड़ा बीनकर अपना गुजारा करता था।
आरोप था कि इसी दौरान आरोपी ने बच्चे के साथ यौन अपराध किया। घटना के बाद बच्चे ने इलाके में बेघर लोगों को मुफ्त चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने के लिए कार्यक्रम कर रहे कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं को इसकी जानकारी दी। सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मामले की सूचना पुलिस हेल्पलाइन पर दी, जिसके बाद पुलिस ने कार्रवाई शुरू की।
मामला आगे जांच और सुनवाई की प्रक्रिया से गुजरा। निचली अदालत ने अगस्त 2025 में आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 377 और पॉक्सो अधिनियम की धारा 6 के तहत दोषी ठहराया था। इसके बाद आरोपी ने इस फैसले के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया। हाईकोर्ट ने 10 अगस्त 2026 को अपने फैसले में दोषसिद्धि को बरकरार रखा।
बचाव पक्ष ने किन बातों पर उठाए सवाल?
हाईकोर्ट में आरोपी की ओर से कई तर्क दिए गए। बचाव पक्ष ने बच्चे की गवाही में मौजूद कुछ कथित विसंगतियों को आधार बनाया। खास तौर पर घटना की तारीख, समय और बच्चे द्वारा पहने गए कपड़ों के बारे में दिए गए अलग-अलग विवरणों का उल्लेख किया गया।
बचाव पक्ष की ओर से यह भी दलील दी गई कि अभियोजन पक्ष पर्याप्त रूप से यह साबित नहीं कर पाया कि घटना के समय बच्चे की उम्र 12 साल से कम थी।
यह तर्क इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि पॉक्सो कानून में बच्चे की उम्र और अपराध की प्रकृति दोनों का कानूनी महत्व है। लेकिन हाईकोर्ट ने उपलब्ध रिकॉर्ड और स्कूल के दस्तावेजों को देखते हुए उम्र को लेकर उठाई गई आपत्ति को स्वीकार नहीं किया। अदालत के सामने स्कूल रिकॉर्ड में बच्चे की जन्मतिथि 12 अक्टूबर 2005 दर्ज थी। इस आधार पर घटना के समय उसकी उम्र 11 साल तय होती थी।
बच्चे ने अपनी उम्र 15 साल बताई थी, फिर भी कोर्ट ने गवाही क्यों मानी?
मामले की सुनवाई के दौरान बच्चे ने अपनी उम्र करीब 15 साल बताई थी। पहली नजर में यह बात बचाव पक्ष के लिए महत्वपूर्ण लग सकती थी, लेकिन हाईकोर्ट ने इसे पूरी गवाही को खारिज करने का आधार नहीं माना।
अदालत ने बच्चे की सामाजिक और पारिवारिक परिस्थितियों को भी ध्यान में रखा। वह कोई ऐसा बच्चा नहीं था जो नियमित रूप से स्कूल जाता हो, जिसके पास जन्म प्रमाणपत्र या अपनी जन्मतिथि की जानकारी आसानी से उपलब्ध हो या जो किसी स्थिर पारिवारिक माहौल में रह रहा हो।
कोर्ट ने माना कि ऐसे बच्चे से अपनी सही उम्र या जन्मतिथि बताने की अपेक्षा करना व्यावहारिक नहीं है। जब आधिकारिक स्कूल रिकॉर्ड उसकी उम्र को स्पष्ट कर रहा था, तो केवल बच्चे द्वारा अपनी उम्र गलत बताने से उसकी पूरी गवाही अविश्वसनीय नहीं हो जाती।
तारीख और कपड़ों की जानकारी में अंतर को कोर्ट ने क्यों नजरअंदाज किया?
हाईकोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा इसी सवाल से जुड़ा है। अदालत ने माना कि बच्चे के बयान में कुछ छोटी विसंगतियां थीं। घटना का सटीक समय, कपड़ों का रंग और सामाजिक कार्यकर्ताओं या पुलिस के मौके पर पहुंचने के क्रम को लेकर पूरी तरह एक जैसा विवरण नहीं था।
लेकिन अदालत ने यह भी देखा कि गवाही के मूल हिस्से में लगातार समानता बनी रही।
बच्चे ने आरोपी की पहचान, घटना के स्थान, उसके साथ हुए अपराध की प्रकृति और घटना के बाद की परिस्थितियों के बारे में मूल रूप से एक ही कहानी बताई। अदालत ने माना कि ऐसी परिस्थितियों में छोटी-छोटी असंगतियों को आधार बनाकर पूरी गवाही को खारिज करना उचित नहीं होगा।
यही वह बिंदु है जहां हाईकोर्ट ने एक व्यापक सामाजिक वास्तविकता को अपने फैसले में जगह दी। अदालत के अनुसार, बेघर और असुरक्षित परिस्थितियों में रहने वाले बच्चे की याददाश्त और किसी स्थिर वातावरण में रहने वाले बच्चे की परिस्थितियों की तुलना एक ही पैमाने से नहीं की जा सकती।
चोट के निशान नहीं मिले तो क्या गवाही कमजोर हो जाती है?
बचाव पक्ष की ओर से बच्चे के शरीर पर चोट के निशान नहीं होने की बात भी उठाई गई थी। हाईकोर्ट ने इस तर्क को भी स्वीकार नहीं किया।
अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी यौन अपराध के मामले में पीड़ित के शरीर पर चोट के निशान नहीं मिलना अपने आप में उसकी विश्वसनीय गवाही को खत्म नहीं करता। इस मामले में कोर्ट ने बच्चे के बयान को समग्र रूप से देखा और माना कि उसकी मुख्य गवाही में पर्याप्त निरंतरता थी।
यह टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अदालत ने केवल मेडिकल या भौतिक साक्ष्य को नहीं देखा, बल्कि परिस्थितियों, बच्चे की उम्र, उसकी सामाजिक स्थिति और घटना के बाद उसके व्यवहार को भी समग्र रूप से परखा।
सड़क पर रहने वाले बच्चे के मामले में कोर्ट की टिप्पणी क्यों अहम?
इस फैसले का सबसे बड़ा संदेश केवल आरोपी की दोषसिद्धि बरकरार रखना नहीं है। इसके पीछे एक महत्वपूर्ण न्यायिक दृष्टिकोण भी दिखाई देता है।
सड़क पर रहने वाले बच्चों की जिंदगी सामान्य बच्चों से बिल्कुल अलग होती है। उनके पास स्थायी घर, नियमित स्कूल, सुरक्षित पारिवारिक वातावरण और कई बार अपनी उम्र या जन्मतिथि से जुड़े दस्तावेज भी नहीं होते। उन्हें रोजमर्रा की जिंदगी में ही असुरक्षा, आर्थिक परेशानी और अनिश्चितता का सामना करना पड़ता है।
ऐसे में यदि किसी बच्चे से किसी पुरानी और traumatising घटना के बारे में वर्षों बाद पूछताछ की जाती है, तो उससे हर मिनट, हर तारीख और हर छोटी चीज का सटीक विवरण याद रहने की उम्मीद करना व्यावहारिक नहीं हो सकता।
दिल्ली हाईकोर्ट ने इसी वास्तविकता को ध्यान में रखते हुए कहा कि ऐसे बच्चे की गवाही को उसके सामाजिक संदर्भ से अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए।
20 साल की सजा घटकर 10 साल क्यों हुई?
यह फैसला पढ़ते समय एक सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि जब हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि बरकरार रखी तो सजा कम क्यों की गई?
इसका संबंध पॉक्सो कानून में हुए बदलाव से है।
अपराध नवंबर 2016 में हुआ था। उस समय पॉक्सो अधिनियम की धारा 6 के तहत न्यूनतम सजा 10 साल थी। बाद में कानून में संशोधन किया गया और 16 अगस्त 2019 से इस अपराध के लिए न्यूनतम सजा बढ़ाकर 20 साल कर दी गई।
निचली अदालत ने अगस्त 2025 में आरोपी को 20 साल की जेल की सजा सुनाई थी। हाईकोर्ट ने माना कि जिस समय अपराध हुआ था, उस समय लागू कानून के अनुसार सजा का आधार तय होना चाहिए। इसलिए अदालत ने 20 साल की सजा को घटाकर 10 साल कर दिया।
इसका मतलब यह नहीं है कि हाईकोर्ट ने अपराध को कम गंभीर माना। सजा में बदलाव का आधार अपराध के समय लागू कानून था, जबकि दोषसिद्धि को अदालत ने बरकरार रखा।
निचली अदालत के फैसले में हाईकोर्ट ने क्या माना?
अगस्त 2025 में निचली अदालत ने आरोपी को दोषी माना था। हाईकोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या गवाही में मौजूद विसंगतियां इतनी गंभीर थीं कि दोषसिद्धि को खत्म कर दिया जाए।
हाईकोर्ट ने ऐसा नहीं माना।
अदालत ने कहा कि गवाही के मुख्य हिस्से लगातार बने रहे और जिन बातों में अंतर था, वे मामले के मूल आरोप को कमजोर करने वाली नहीं थीं। बच्चे की सामाजिक स्थिति और उसके जीवन की परिस्थितियों को भी अदालत ने ध्यान में रखा।
इस तरह हाईकोर्ट ने निचली अदालत के निष्कर्ष में हस्तक्षेप नहीं किया और आरोपी की दोषसिद्धि कायम रही।
इस फैसले से बच्चों से जुड़े मामलों में क्या संदेश जाता है?
इस मामले का एक व्यापक पहलू बाल संरक्षण से जुड़ा है। किसी बच्चे के खिलाफ यौन अपराध की शिकायत आने पर सिर्फ यह देखना पर्याप्त नहीं होता कि बच्चा हर छोटी बात कितनी सटीकता से बता पा रहा है। उसकी उम्र, मानसिक स्थिति, सामाजिक परिस्थितियां और घटना के बाद सामने आने वाली परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण होती हैं।
खास तौर पर सड़क पर रहने वाले बच्चों के मामले में चुनौतियां और ज्यादा होती हैं। ऐसे बच्चों के पास कई बार परिवार का स्थायी सहारा नहीं होता। वे स्कूल से बाहर हो सकते हैं और उनके पास जरूरी दस्तावेज भी नहीं होते।
इस मामले में भी बच्चे की उम्र को लेकर विवाद पैदा हुआ, लेकिन स्कूल रिकॉर्ड ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इससे यह भी पता चलता है कि बच्चों की पहचान, जन्मतिथि और शिक्षा से जुड़े रिकॉर्ड कितने महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
सामाजिक कार्यकर्ताओं की भूमिका भी सामने आई
इस मामले में एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि घटना की जानकारी सामने आने में सामाजिक कार्यकर्ताओं की भूमिका रही। रिपोर्ट के मुताबिक, वे इलाके में बेघर लोगों को मुफ्त चिकित्सा सहायता देने के लिए कार्यक्रम कर रहे थे। बच्चे ने उन्हें घटना के बारे में बताया, जिसके बाद पुलिस हेल्पलाइन पर सूचना दी गई।
ऐसी घटनाओं में समाज के आसपास मौजूद लोगों की संवेदनशीलता बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। खासकर जब पीड़ित बच्चा खुद पुलिस या कानूनी प्रक्रिया तक पहुंचने की स्थिति में न हो, तब किसी सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षक, डॉक्टर या जिम्मेदार नागरिक की भूमिका निर्णायक हो सकती है।
फैसला सिर्फ एक केस नहीं, एक बड़ी सामाजिक तस्वीर भी दिखाता है
दिल्ली हाईकोर्ट का यह फैसला एक पुराने आपराधिक मामले का कानूनी निष्कर्ष है, लेकिन इसके पीछे भारत में बेघर बच्चों की स्थिति का एक गंभीर सवाल भी छिपा हुआ है।
किसी बच्चे का सड़क पर रहना केवल गरीबी का मामला नहीं है। इसके साथ शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, पहचान और कानूनी संरक्षण जैसे कई सवाल जुड़े होते हैं। ऐसे बच्चे किसी अपराध के शिकार होते हैं तो उनके लिए न्याय व्यवस्था तक पहुंचना भी मुश्किल हो सकता है।
इस मामले में बच्चा सामाजिक कार्यकर्ताओं के संपर्क में आया, घटना की जानकारी दी और मामला पुलिस तक पहुंचा। बाद में अदालतों ने उसकी गवाही और उपलब्ध रिकॉर्ड की जांच की। लगभग एक दशक बाद हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि को बरकरार रखा।
यह पूरी प्रक्रिया बताती है कि कमजोर सामाजिक पृष्ठभूमि वाले बच्चे की बात सुनना और उसे कानूनी संरक्षण देना कितना जरूरी है।
क्या है पूरे मामले का निष्कर्ष?
दिल्ली हाईकोर्ट ने आरोपी की दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए साफ किया कि किसी बच्चे की गवाही का मूल्यांकन उसकी सामाजिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। बेघर बच्चे से किसी घटना की तारीख, समय, कपड़े या हर छोटी जानकारी को बिल्कुल सटीक तरीके से याद रखने की उम्मीद नहीं की जा सकती।
इस मामले में कोर्ट ने माना कि छोटी-मोटी विसंगतियां तब निर्णायक नहीं हो जातीं, जब गवाही के मूल हिस्से में निरंतरता बनी हुई हो और उपलब्ध रिकॉर्ड उससे मेल खाते हों। बच्चे की उम्र को लेकर भी स्कूल रिकॉर्ड को महत्वपूर्ण माना गया।
सजा के मामले में अदालत ने 20 साल की सजा को 10 साल किया, क्योंकि अपराध के समय लागू कानून में न्यूनतम सजा 10 साल थी। लेकिन दोषसिद्धि में कोई बदलाव नहीं किया गया।
यह फैसला इस बात की याद दिलाता है कि न्याय केवल घटना के कानूनी पहलुओं को देखने का नाम नहीं है। न्याय करते समय यह समझना भी जरूरी है कि जिस व्यक्ति की गवाही अदालत के सामने है, वह किस तरह की जिंदगी से होकर वहां तक पहुंचा है। खासकर बच्चों के मामलों में उनकी उम्र, असुरक्षा और सामाजिक परिस्थितियों को नजरअंदाज करके साक्ष्य का आकलन करना न्याय की तस्वीर को अधूरा कर सकता है।
मामले की बड़ी बातें
- मामला नवंबर 2016 का है।
- पीड़ित बच्चा घटना के समय 11 साल का था।
- बच्चा कश्मीरी गेट इलाके में रेलवे पुल के नीचे रहता था।
- सामाजिक कार्यकर्ताओं की सूचना के बाद पुलिस को घटना की जानकारी मिली।
- निचली अदालत ने अगस्त 2025 में आरोपी को दोषी ठहराया।
- दिल्ली हाईकोर्ट ने 10 अगस्त 2026 को दोषसिद्धि बरकरार रखी।
- हाईकोर्ट ने 20 साल की सजा को घटाकर 10 साल किया।
- अदालत ने कहा कि बेघर बच्चे से हर छोटी जानकारी की सटीकता की उम्मीद नहीं की जा सकती।
- कोर्ट ने बच्चे की गवाही के मूल हिस्से में निरंतरता को महत्वपूर्ण माना।
- 20 साल की न्यूनतम सजा वाला पॉक्सो प्रावधान 16 अगस्त 2019 से लागू हुआ था।
