
उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में ₹10 प्रति लीटर की दर से गोमूत्र खरीदने का पायलट प्रोजेक्ट शुरू हुआ है। सरकार के मुताबिक इसका उद्देश्य पशुपालकों को अतिरिक्त आय देना, ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक गतिविधि से जोड़ना और गोमूत्र से प्राकृतिक खेती के लिए जैविक उत्पाद तैयार करना है। फिलहाल यह योजना 15 गांवों में पायलट स्तर पर चल रही है।
लेकिन इस फैसले ने एक बड़ा सवाल भी खड़ा किया है—जब देश में किसान खेती की लागत, सिंचाई, बाजार, मौसम, मिट्टी की सेहत और आधुनिक कृषि तकनीक जैसी कई चुनौतियों से जूझ रहे हैं, तब सरकारी संसाधनों और नीति का कितना हिस्सा ऐसी योजनाओं पर लगाया जाना चाहिए?
सवाल योजना से ज्यादा प्राथमिकता का है
गोमूत्र का इस्तेमाल प्राकृतिक खेती में जैविक input के तौर पर किया जाता है। इसलिए इसके संग्रह और प्रसंस्करण को पूरी तरह निरर्थक बताना सही नहीं होगा। प्राकृतिक खेती की कई पद्धतियां स्थानीय संसाधनों, गोबर और गोमूत्र जैसे inputs का इस्तेमाल करती हैं।
लेकिन किसी छोटे पायलट को पूरे कृषि संकट का समाधान मान लेना भी उचित नहीं होगा।
किसानों के सामने आज ज्यादा बड़े सवाल हैं—उत्पादन की लागत कैसे घटे, पानी की उपलब्धता कैसे सुधरे, मिट्टी की गुणवत्ता कैसे बचाई जाए, फसल का उचित दाम कैसे मिले और खेती में नई तकनीक छोटे किसानों तक कैसे पहुंचे।
ऐसे में सरकार से यह सवाल पूछा जाना स्वाभाविक है कि गोमूत्र खरीद के साथ-साथ इन बुनियादी समस्याओं पर कितना जोर दिया जा रहा है।
₹10 प्रति लीटर की योजना से कितना फायदा?
रिपोर्टों के मुताबिक इस पायलट में रोज लगभग 500 लीटर गोमूत्र संग्रह का लक्ष्य/व्यवस्था बताई गई है। 10 रुपये प्रति लीटर के हिसाब से यह करीब 5,000 रुपये प्रतिदिन की खरीद बनती है। योजना में ग्रामीण महिलाओं को भी संग्रह व्यवस्था से जोड़कर प्रति लीटर कमीशन देने की बात सामने आई है।
इससे कुछ परिवारों को अतिरिक्त आय मिल सकती है। लेकिन असली सवाल यह है कि अगर इस मॉडल को पूरे उत्तर प्रदेश में लागू किया जाता है तो इसका कुल आर्थिक लाभ कितना होगा और प्रशासनिक तथा संग्रह लागत कितनी होगी?
योजना की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होगी कि कितने लीटर गोमूत्र खरीदा गया। यह देखना भी जरूरी होगा कि इससे किसानों की वास्तविक आय कितनी बढ़ी, प्राकृतिक खेती में कितना इस्तेमाल हुआ और तैयार उत्पादों की मांग कितनी बनी।
क्या सरकार को खेती में दूसरी प्राथमिकताओं पर ज्यादा जोर देना चाहिए?
उत्तर प्रदेश जैसे बड़े कृषि राज्य में किसानों की जरूरतें बहुत व्यापक हैं। बेहतर सिंचाई, मृदा परीक्षण, वैज्ञानिक सलाह, फसल विविधीकरण, भंडारण, बाजार तक पहुंच और कृषि तकनीक में निवेश का सीधा असर बड़ी संख्या में किसानों पर पड़ सकता है।
यही वजह है कि गोमूत्र खरीद योजना को लेकर बहस केवल धार्मिक या राजनीतिक मुद्दा नहीं होनी चाहिए। असली सवाल यह होना चाहिए कि किस योजना से किसान की आय और खेती की उत्पादकता में वास्तविक और मापने योग्य सुधार हो रहा है?
सरकार को जवाब आंकड़ों से देना होगा
अगर पायलट सफल होता है और इससे पशुपालकों की आय बढ़ती है, महिलाओं को रोजगार मिलता है तथा प्राकृतिक खेती के लिए उपयोगी जैविक inputs तैयार होते हैं, तो इसे एक ग्रामीण अर्थव्यवस्था मॉडल के रूप में देखा जा सकता है।
लेकिन अगर इसका लाभ सीमित रहता है और लागत अपेक्षा से ज्यादा निकलती है, तो सरकार को इसकी समीक्षा करनी चाहिए।
इसलिए फिलहाल इस योजना को न तो तुरंत “किसानों के लिए क्रांतिकारी कदम” कहना उचित होगा और न ही बिना आंकड़ों के इसे “फालतू योजना” घोषित करना।
असल परीक्षा यही है—क्या ₹10 प्रति लीटर का यह मॉडल किसानों की आय, खेती की लागत और मिट्टी की सेहत में ऐसा सुधार ला पाएगा जिसे आंकड़ों से साबित किया जा सके?
बुलंदशहर का यह प्रयोग छोटा है, लेकिन इससे बड़ी कृषि नीति पर बहस जरूर शुरू हो सकती है। उत्तर प्रदेश सरकार को अगर इसे आगे बढ़ाना है तो केवल खरीद के आंकड़े नहीं, बल्कि किसान की अतिरिक्त आय, उत्पादन लागत, तैयार जैविक उत्पादों की मांग और खेती पर वास्तविक प्रभाव के आंकड़े भी सार्वजनिक करने चाहिए।
क्योंकि खेती में असली सफलता किसी चीज को खरीदने में नहीं, बल्कि किसान की जिंदगी और उसकी कमाई में दिखाई देने वाले बदलाव में मापी जानी चाहिए।
